चित्रण: रमनदीप कौर/दिप्रिंट


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अगर भारतीय जनता पार्टी का कोई थीम सॉन्ग होता तो बहुत संभव था कि यह ब्रिटनी स्पीयर्स का ‘उप्स !…आई डिड इट अगेन ’ ही होता. भाजपा सार्वजनिक आलोचना या फिर किसी आसन्न चुनाव के मद्देनज़र अपने नीतिगत फैसलों को इतनी बार वापस ले चुकी है कि अब यह शर्मिंदगी का सबब बनने लगा है. इस बार यह पांच राज्यों के चुनाव थे जिन्होंने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को सुबह 7.54 बजे यह एहसास कराया कि उन्होंने कुछ चूक कर दी है— एक फैसला उनकी ‘नज़र में’ आए बिना ही ले लिया गया है.

अगर आपको ऐसा लगता है कि नरेंद्र मोदी-अमित शाह की सरकार दोनों सदनों में अपना बहुमत होने के कारण कोई भी कदम, खासकर अनुच्छेद 370 पर फैसले के बाद उठा सकती है तो एक बार फिर इस पर गौर करें.


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सामान्य कार्यप्रणाली

31 मार्च को वित्त मंत्रालय की वेबसाइट ने आर्थिक मामलों के विभाग की तरफ से जारी एक ‘ऑफिस मेमोरेंडम’ को अपलोड किया, जिसमें तमाम छोटी बचत योजनाओं पर ब्याज दरों में 40 से 110 बेसिस प्वाइंट की अच्छी-खासी कटौती किए जाने की सूचना दी गई थी. निर्मला सीतारमण ने अगली सुबह इस फैसले को यह कहते हुए पलट दिया कि इसे भूलवश जारी कर दिया गया था. हालांकि, शीर्ष नौकरशाहों ने पुष्टि की है कि ऐसे फैसले ‘ओवरसाइट’ नहीं हो सकते हैं क्योंकि इस तरह के निर्णय लेने की प्रक्रिया काफी चाक-चौबंद है.

एक वरिष्ठ अधिकारी की द इंडियन एक्सप्रेस से हुई बातचीत के मुताबिक, ‘छोटी बचत पर त्रैमासिक ब्याज दरें निर्धारित करने संबंधी फाइल उपनिदेशक से निदेशक, बजट के पास से लेकर संयुक्त सचिव या अतिरिक्त सचिव बजट और आर्थिक मामलों के विभाग के सचिव के पास तक जाती है. इस तरह ये दरें बजट डिवीजन के भीतर, आमतौर पर वित्त मंत्री की पूर्व जानकारी के साथ, तय की जाती हैं.’ जाहिर है, इस संबंध में पहले जारी फैसले ने मध्यम वर्ग को परेशान कर दिया था और इससे पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा के लिए स्थितियां प्रतिकूल हो सकती थीं.

लेकिन यह पहला मौका नहीं है जब भाजपा ने ऐसा कुछ किया है. पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली की तरफ से लागू माल एवं सेवा कर (जीएसटी) में भी बाद में कई बार रोलबैक हुआ— टैक्स स्लैब से लेकर कर योग्य आइटम तक.

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