एक रोड शो के दौरान दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का प्लेकॉर्ड उठाते उनके समर्थक | एएनआई फाइल फोटो


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5 अप्रैल 2011 को एक जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने लोकपाल संस्था के गठन के लिए नया कानून बनाने की मांग को लेकर ‘आमरण अनशन’ शुरू किया था, जो भारत सरकार के अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायतों को एक स्वायत्त निकाय की तरह देखे.

अब आंदोलन की दसवीं वर्षगांठ पर हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो कह सकते हैं कि यह नाकाम रहा है. मनमोहन सिंह सरकार ने एक लोकपाल कानून पारित किया था, लेकिन भारत के पहले लोकपाल की नियुक्ति 2019 में जाकर हो पाई थी. नए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसी को नियुक्त करने में कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई. और हालांकि, लोकपाल पिनाकी चंद्रा को शिकायतें मिली हैं, लेकिन किसी में भी भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई परिवर्तनकारी कार्रवाई होने जैसा नतीजा सामने नहीं आया है. इस तरह यह निकाय एक कागजी शेर ही बना हुआ है.

लोकपाल पर विचार दरअसल भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को कार्यपालिका से स्वायत्तता प्रदान करने की मांग था. अगर कुछ हुआ तो यह, प्रवर्तन निदेशालय और अन्य निकायों की तरफ से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राजनीतिक विरोधियों को खुलकर निशाना बनाए जाने के साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का पहले से कहीं अधिक राजनीतिकरण हो गया है. सूचना का अधिकार कानून बनने के बाद लोकपाल का विचार पारदर्शिता की दिशा में अगला कदम था. लेकिन हुआ तो बस यह कि आरटीआई कानून और उस पर अमल करने वाली एजेंसियां कमजोर होने के साथ भारत सरकार और भी कम पारदर्शी हो गई. मार्च 2020 में सरकार ने लोकपाल के लिए नए नियमों को अधिसूचित किया जिसके तहत किसी भी मौजूदा या पूर्व प्रधानमंत्री के खिलाफ कोई भी जांच सार्वजनिक नहीं की जाएगी. और शिकायत को खारिज कर दिया जाता है तो किसी को भी उसका रिकॉर्ड मुहैया नहीं कराया जा सकता है!


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अपने उद्देश्यों से भटक जाना

हालांकि, इसमें कोई संदेह नहीं है कि लोकपाल आंदोलन यूपीए-2 सरकार को घुटनों पर ला देने वाली एक बड़ी राजनीतिक सफलता थी, जिसने निश्चित तौर पर उसे अलोकप्रिय बनाया और जैसी कई लोगों की दलील है, नरेंद्र मोदी के लिए रास्ता भी साफ किया. अपने ऐतिहासिक महत्व के कारण यह मंडल और मंदिर, जेपी और ‘निर्भया’ जैसे बड़े आंदोलनों की श्रेणी में खड़ा होता है.

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