धुबरी, असम में एक AIUDF उम्मीदवार का बैनर/रूही तिवारी/दिप्रिंट


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धुबरी: ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) को 2005 में इसके गठन के समय से ही तमाम लोगों की तरफ से ‘मियांओं’ (असम में बंगाली मूल के मुसलमानों के संदर्भ में) और असम विरोधियों की पार्टी करार दिया जाता रहा है. असम के राजनीतिक परिदृश्य में यह हमेशा ‘अन्य’ की श्रेणी में रही और यहां तक कि कांग्रेस ने भी इसे ‘सांप्रदायिक’ पार्टी कह डाला.

बहरहाल, असम का यह विधानसभा चुनाव एक तरह से ऐतिहासिक है. ‘महाजोत’—कांग्रेस, एआईयूडीएफ और लेफ्ट का गठबंधन—का बनना इत्र कारोबारी बदरुद्दीन अजमल की पार्टी का राजनीतिक वनवास खत्म होने और उसके पारंपरिक और मुख्यधारा के खेमे में शामिल होने को दर्शाता है. अजमल की पार्टी राज्य की 126 विधानसभा सीटों में से 21 पर चुनाव लड़ रही है.

हालांकि, इस गठबंधन का मुख्य उद्देश्य अल्पसंख्यक वोटों का विभाजन रोकना—जो असम के कुल मतदाताओं में करीब 35 फीसदी है—जमीनी तौर पर कितना सफल होता है, यह तो वक्त ही बताएगा. किसी भी नए गठबंधन की तरह, यहां भी यह सवाल मौजूं है कि क्या वोट ट्रांसफर होगा. इस मामले में यह देखना सबसे महत्वपूर्ण है कि क्या यह गठबंधन असमिया भाषी और बंगाली भाषी मुस्लिम दोनों को स्वीकार होगा.

असम में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उत्थान के बाद से यहां के मुसलमानों, खासकर मूल निवासियों में, के बीच असुरक्षा की भावना काफी बढ़ गई है—यह ऐसी भावना है जिसका कांग्रेस या असोम गण परिषद (एजीपी) के समय उनको कोई भान तक नहीं था. महाजोत भी असुरक्षा की यह भावना और मुस्लिम मतदाताओं की भाजपा को सत्ता से बाहर करने की इच्छा को भुनाने की पूरी कोशिश में है.


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