चीन के विदेश मंत्री वांग यी अपने ईरानी समकक्ष जवद ज़रीफ के साथ | फोटो: ट्विटर/@MFA_China


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चीन और ईरान के बीच 25 साल के आर्थिक सहयोग समझौते से भारत को कई कारणों से चिंतित होना चाहिए और उसे क्षेत्र के देशों के प्रति अपनी नीतियों पर पुनर्विचार भी करना चाहिए. ईरान के साथ चीन का, तेहरान में 24 मार्च को हस्ताक्षरित 400 बिलियन डॉलर का समझौता दोनों सर्वसत्तावादी देशों के बीच दोस्ताना संबंधों के विस्तार की नींव साबित होगा.

यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब अमेरिका ईरान पर थोपे गए प्रतिबंधों को हटाने का कोई संकेत नहीं दे रहा है. जबकि जो बाइडन प्रशासन से उम्मीद की जा रही थी कि वो परमाणु कार्यक्रम जैसे बुनियादी मुद्दों पर कोई समझौता किए बिना डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों को उलट देगा और ईरान के प्रति सुलहपूर्ण रवैया अपनाएगा.


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भारत को ईरान से सहयोग की ज़रूरत

भारत ने ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों को लेकर अपनी चिंताओं को बारंबार दोहराया है. होर्मुज जलसंधि के पास रणनीतिक अवस्थिति वाला बंदर अब्बास बंदरगाह, जो कि भारत के लिए अधिकतम कार्गो संभालता था, के भारतीय व्यापार के लिए अनुपलब्ध होने से व्यापार लागत कई गुना बढ़ गई है. ईरान भारत का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा आपूर्तिकर्ता रहा है और प्रतिबंधों के कारण ईरानी आपूर्ति ठप होने का तेल की बढ़ी कीमतों पर असर पड़ने के साथ ही व्यापार संतुलन डगमगा गया है.

ईरानी परमाणु समझौते (ज्वाइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन) से 2018 में अमेरिका के बाहर निकलने के बाद, ईरान पर और प्रतिबंध लगाए गए थे, जिनमें उससे आयात पर पूर्ण प्रतिबंध शामिल था. भारत सहित आठ देशों को केवल छह महीने की छूट दी गई थी जिसकी अवधि मई 2019 में समाप्त हो गई. हालांकि प्रतिबंधों से पहले अपनी आवश्यकता का 80 प्रतिशत से अधिक तेल बाहर से खरीदने वाले भारत के तेल आयात में ईरान का हिस्सा लगभग 10 प्रतिशत ही था, लेकिन कई अन्य कारक हैं जो नई दिल्ली के रणनीतिक और सुरक्षा हितों के खिलाफ जाते हैं. ईरान द्वारा भारत को दी जाने वाली सुविधाओं में 60 दिनों का व्यापार ऋण, ढुलाई और बीमा शुल्कों पर आकर्षक छूट और रुपये में भुगतान के विकल्प जैसी बातें शामिल थीं.

भारत के बहुत जल्द चाबहार पोर्ट का संचालन शुरू करने की संभावना है, जो हमें विरोधी पाकिस्तान पर निर्भरता के बिना अफगानिस्तान तक पहुंचने में सक्षम बनाएगा. अमेरिका यदि अफगानिस्तान के संघर्ष प्रभावित इलाकों में अपनी सामरिक सैन्य बढ़त को खोए बिना वहां से बाहर निकलने के प्रति गंभीर है तो उसके नीति निर्माताओं को इस तथ्य पर गौर करना चाहिए. जमीनी बलों के लिए सुविधाओं के निर्माण में भारत की मदद लेकर अमेरिका पाकिस्तान पर अपनी निर्भरता काफी कम कर सकता है और उसे पाकिस्तानी तालिबान की दया पर भी आश्रित नहीं होना पड़ेगा जो कि अफगान तालिबान के साथ समझौता कराने के लिए अमेरिका से बड़ी कीमत वसूल रहा है.

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