नई दिल्ली में बाए्ं से अफगानिस्तान के विदेश मामलों के मंत्री मोहम्मद हनीफ अतमर विदेश मंत्री एस जयशंकर से मुलाकात करते हुए | ANI


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अफगानिस्तान इस बात का प्रमाण है कि लड़ाई में तकनीकी श्रेष्ठता मात्र ही युद्ध जीतने के लिए एक पर्याप्त नहीं होती. युद्धों के राजनीतिक परिणाम कूटनीतिक वार्ताओं की मेज पर मिलने वाली सफलताओं पर निर्भर करते हैं. वरना अत्याधुनिक तकनीक से लैस दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश पर्याप्त खून बहाने और महंगे संसाधन लुटाने के बावजूद वहां अनुकूल राजनीतिक परिणाम प्राप्त करने में असमर्थ नहीं रहता. हां, इतना जरूर है कि अमेरिका ने अब तक तालिबान को काबुल की सत्ता हथियाने से रोका है. लेकिन वास्तव में इस उपलब्धि की अहमियत भी तब कम हो गई जब डोनल्ड ट्रंप प्रशासन ने फरवरी 2020 में तालिबान के साथ शांति समझौता कर मान लिया कि चरमपंथी अफगान सरकार के साथ तब तक सत्ता में भागीदारी कर सकते हैं बशर्ते अफगानिस्तान को अमेरिका के खिलाफ आतंकवादी हमले के आधार के रूप में उपयोग नहीं किया जाता हो. यह शांति समझौता अशरफ ग़नी की लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार की सहमति के बिना किया गया था. सहयोगियों से पल्ला झाड़ने में अमेरिका को कभी भी ज्यादा परेशानी नहीं हुई है.

शांति प्रक्रिया में 1 मई 2021 तक सभी अमेरिकी सैनिकों की वापसी का लक्ष्य घोषित किया गया था. लेकिन जो बाइडन के राष्ट्रपति बनने के बाद अब ये सौदा खटाई में पड़ता दिख रहा है, क्योंकि अमेरिका को डर है कि अशरफ ग़नी सरकार और तालिबान के बीच सत्ता में साझेदारी का समझौता हुए बिना उसके बाहर निकलने पर तालिबान सत्ता पर कब्जा कर सकता है. अमेरिका समझौते के लिए ग़नी सरकार पर दबाव बना रहा है और शायद पाकिस्तान पर भी कि वह तालिबान को अमेरिकी सैनिकों की आगे भी मौजूदगी समेत कतिपय रियायतें देने के लिए तैयार करे. पाकिस्तान के रुख में कथित बदलाव को 25 फरवरी को डीजी आईएसपीआर के एक ट्वीट के जरिए सार्वजनिक रूप से जाहिर किया गया: ‘आज का अफगानिस्तान वो देश नहीं है, जैसा कि 90 के दशक में था, जिसकी शासकीय संरचना आसानी से ढह गई थी. पाकिस्तान भी बदल चुका है. तालिबान के लिए काबुल पर कब्ज़ा करना और पाकिस्तान द्वारा उसका समर्थन करना अब संभव नहीं है. ऐसा कभी नहीं होगा.’

इस बीच, पाकिस्तान की बुरी आर्थिक स्थिति और परंपरागत अरब सहयोगियों के उससे मुंह मोड़ने के कारण इस्लामाबाद पर अमेरिकी प्रभाव पहले से बढ़ा है.

अंतरअफगान वार्ताओं में संघर्ष विराम; अफगानिस्तान के भावी राजनीतिक रोडमैप पर सहमति; महिलाओं के अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और देश के संविधान में परिवर्तन जैसे मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है. वार्ताओं में तालिबान लड़ाकों और अन्य सशस्त्र मिलिशिया गुटों के भविष्य को लेकर भी सहमति बनानी होगी. पहली मई की अमेरिकी समय सीमा से पहले ये सब हासिल कर पाना बेहद मुश्किल है.


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बड़े उद्देश्य को भुलाना

बाइडन प्रशासन अफगान सरकार और तालिबान प्रतिनिधियों के बीच उच्चस्तरीय बैठकों में सहयोग कर रहा है. ऐसी ही एक बैठक मार्च में मास्को में आयोजित की गई थी, जिसमें अफगानिस्तान मामलों पर अमेरिका के विशेष दूत ज़लमय खलीलज़ाद तथा ईरान, भारत, चीन और पाकिस्तान के प्रतिनिधि भी शामिल हुए थे. अगली बैठक इसी अप्रैल में तुर्की में होनी है. इससे पहले तजाकिस्तान में 30 मार्च को आयोजित हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन अफगानिस्तान पर केंद्रित था और उसमें भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा था: ‘भारत ने अंतरअफगान वार्ताओं सहित अफगानिस्तान सरकार और तालिबान के बीच संवाद बढ़ाने के तमाम प्रयासों का समर्थन किया है.’ उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में एक क्षेत्रीय शांति प्रक्रिया शुरू किए जाने को भारत के समर्थन की भी घोषणा की.

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