गुरिल्लाों की युद्धभूमि में खूनी संघर्ष

दरअसल,  जगरगुंडा अगर नक्सलियों की राजधानी थी तो जोनागुड़ा जहां मुठभेड़ हुई, वो इन गुरिल्लाओं की युद्धभूमि है. खुफिया इनपुट मिला था कि यहां पीजीएलए का कमांडर मांडवी इंदुमल यानी हिडमा छिपा है. सूचना बड़ी थी अहम भी. वर्ष 2010 के बाद से हर बड़ी वारदात का मास्टरमाइंड हिडमा ही पाया गया. लाखों के इनामी हिडमा की बटालियन में 800 से ज्यादा नक्सली हैं, जो छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में छिपते रहते हैं. हिडमा को पकड़ने के लिये 2000 जवानों की टीम अलग-अलग इलाकों से जंगल के अंदर घुस रही थी. नक्सलियों को शायद जवानों के आने का अंदाजा था. इसलिए शुरुआत में उन्होंने जवानों को घने जंगल में अंदर तक घुसने दिया.

हिडमा ने चक्रव्यूह में फंसाया

सूत्रों के मुताबिक, हिडमा की बटालियन ने जवानों को U शेप के चक्रव्यूह में फंसा लिया. यानी आगे बढ़ने का रास्ता बंद. तीन तरफ से जवान घिरे थे.हिडमा की बटालियन पहाड़ के ऊपर थी और जवान नीचे. उसके बाद जवानों की घेराबंदी कर उन पर ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी गई. नक्सली पहाड़ पर थे और जवान खुले मैदान में. तीन घंटे तक गोलीबारी चली. करीब 400 नक्सलियों ने यू शेप में घात लगाया था और तीन तरफ से जवानों को घेर लिया था. इलाके की स्थिति को देखे बग़ैर कुछ कहना संभव नहीं है लेकिन इस घटना का यह विवरण बताता है कि हमारी रणनीति में कितनी चूक थी। सरकार नहीं मानेगी लेकिन 700 जवान एक नक्सली को पकड़ने निकले और तीन तरफ से घिर जाएं तो बता रहा है कि तमाम सतर्कता के बाद भी रणनीतिक चूक किसकी रही होगी.

हर मूवमेंट की खबर नक्सलियों को थी

हमले में घायल सीआरपीएफ के अधिकारी संदीप द्विवेदी ने बताया हम लोग रात में निकले थे, 3 तारीख को. हमें जानकारी पहले से थी कि वहां पर कुछ हो सकता है. हम लोग रात भर चलते रहे सुबह लोकेशन पर पहुंचे. जब हम वापस आ रहे थे तो, उन्होंने मुठभेड़ का पहले से प्लान करके रखा था. उनके हमारे मूवमेंट की खबर पहले से हो रखी थी. पहले हम लोगों ने उन पर फायर किया. फिर उनके तरफ से फायर हुआ. हमारे लड़कों ने बहुत बहादुरी से लड़ाई लड़ी, उनको भी नुकसान पहुंचा, लेकिन हमारा जान-माल का नुकसान ज्यादा हो गया. जवानों ने जोनागुड़ा से लगे गांव की ओर पोजिशन के लिए वहां जाने की कोशिश की, लेकिन नक्सलियों ने वहां भी उनका पीछा कर फायरिंग की.

नक्सलियों को नुकसान के दावे पर सबूत नहीं

नक्सली हमला कर हथियार, सामान लूटते गए और पीछे जंगलों में भागते गए. डीजी एंटी नक्सल ऑपरेशन  अशोक जुनेजा ने बताया कि नक्सलियों ने रॉकेट लॉन्चर, ग्रेनेड और आधुनिक हथियारों के साथ धावा बोला था.सरकार का कहना है हमले में नक्सलियों को भी बहुत नुकसान हुआ है, वो ट्रैक्टरों में भरकर अपने साथियों के शव को ले गये. खुद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा  नक्सलियों का भी बड़ा नुकसान हुआ है, चार ट्रैक्टर में घायलों को ले गए हैं. हमारे जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा. हमारे जवानों ने अदम्य साहस और बहादुरी के साथ नक्सलियों का मुकाबला किया है, जिससे नक्सलियों को काफी नुकसान हुआ है. मुख्यमंत्री ने कहा कि हमारे जवान बुलन्द हौसले के साथ नक्सलियों से लड़े। उनकी शहादत पर हमें गर्व है.

खुफिया चूक मानने को कोई तैयार नहीं

हालांकि कोई ये नहीं मान रहा है कि खुफिया रणनीति में कोई चूक हुई है, सिवाय कांग्रेस नेता राहुल गांधी के. राहुल ने ट्वीट कर कहा कहा है 1-1 के अनुपात में मौत का मतलब है पूरा ऑपरेशन गलत और अक्षम था. जबकि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने दावा किया था कोई विफलता नहीं है, छत्तीसगढ़ में नक्सलियों का प्रभाव लगातार सिमट रहा है और उनका असर अब केवल एक सीमित क्षेत्र में रह गया है, इससे बौखलाकर वह अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए इस तरह की घटनाएं कर रहे हैं. हम उनके प्रभाव क्षेत्र में लगातार पुलिस शिविर स्थापित कर रहे हैं और आगे भी यह कार्य जारी रखेंगे. लेकिन सुरक्षाबलों को लगता है कि नक्सलियों के पास पूरी जानकारी थी, सीआरपीएफ के घायल अधिकारी संदीप द्विवेदी ने बताया 400 की संख्या में हम लोग गए हुए थे.जो बाकी पार्टियां लगी हुई थी हमसे थोड़ी दूर थी. हमारी सारी खबर उनको मिल गई थी. उनकी सिविल टीम जो रेकी करती है. वह अपने तरीके से ट्रेस कर रहे थे. उन्होंने उस हिसाब से पोजीशन पहले से ही रखा था. जहां हम गए हैं और वापस आएंगे.

सवालों का जवाब कौन देगा

 दरअसल, फरवरी से जून के बीच जब जंगल में पेड़ों के पत्ते झड़ जाते हैं, दूर तक मूवमेंट देखना आसान होता है तब नक्सली टेक्टिकल काउंटर अफेंसिव कैंपेन यानी टीसीओसी चलाते हैं, चूक हुई नहीं हुई, ट्रैप था नहीं था. एसओपी का पालन हुआ नहीं हुआ. सुरक्षाबल ने पहाड़ी रास्ता क्यों नहीं लिया. अब ये सवालों की जद में रहेगा. बस फर्क इतना है जवाब चाहे जो हो ये 22 जवान लौटकर घर नहीं आएंगे. सरकार कह रही है कि नक्सली भी बड़ी संख्या में मारे गए हैं लेकिन एक ही लाश मिली है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री कहते हैं कि तीन ट्रैक्टर लाशें लेकर नक्सली गए हैं मगर कहां लेकर चले गए हैं किसी को पता नहीं

दंतेवाड़ा का मास्टरमाउंड है हिडमा

जिस हिडमा के होने की सूचना की बात बताई जा रही है वो एक खतरनाक नक्सली है। 2010 के दंतेवाड़ा में हुई नक्सली हिंसा में CRPF के 70 जवान शहीद हो गए थे मगर आज तक यह हिड़मा हाथ नहीं आया है। फिर भी गृहमंत्री कहते हैं कि किसी को बख्शा नहीं जाएगासूत्रों के मुताबिक नक्सलियों ने खुद हिड़मा की मौजूदगी की खबर लीक कर फोर्स को फांसा, वहां फंसाया जहां मिलिट्री बटालियन वन और सीआरसी मौजूद थी, जवानों को पहले भीतर आने दिया फिर तीन ओर से घेर कर अंधाधुंध फ़ायरिंग की। ये तो हमारी रणनीति की हालत है.

अब तक गिरफ्तार क्यों नहीं हुआ हिडमा

मुश्किल है कि आपको यह सब बताने के बजाय टीवी स्टुडियो से उन्हें ललकारा जाएगा जिनका इससे कोई संबंध नहीं है। आपका ध्यान भी इन सवालों की जगह कहीं और भटका दिया जाएगा। क्या यह किसी की नाकामी नहीं है कि 2010 से लेकर आज तक हिडमा गिरफ्तर से बाहर है औऱ जवान तीसरी बार इतनी बड़ी संख्या में शहीद हो गए हैं. जब यह घटना हुई तब गृह मंत्री अमित शाह भी चुनावी सभा में थे और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भी. दोनों ने चुनावी कार्यक्रम रद्द कर दिए. अमित शाह दिल्ली लौट आए और मुख्यमंत्री बघेल रायपुर.

शांति की उम्मीदों को झटका

दो साल पहले जगरगुंडा मैं और मेरे कैमरा सहयोगी रिजवान खान उम्मीद की तलाश में गए थे. 13 साल पहले नक्सलियों ने जिसे बुझा दिया था, रास्ते में सुरक्षाबलों की टोली गश्त पर. चाक-चौबंद थी, लेकिन रास्ते में जलाई गई गाड़ियां,  धमाके में उड़ाए गए पुल-पुलिया, और भी कई निशान जो नक्सलियों ने छोड़े थे. इस सन्नाटे में स्कूल की घंटी बजी थी 13 साल बाद. सलवा जुडुम के शुरू होने के साथ आस पास के इलाको के बच्चों की भविष्य के रास्ते बंद हो गए थे.

क्या शहादत का बदला लिया जाएगा

लेकिन 2 साल बाद वापस इन 22 जवानों की मौत पर मातम की इन तस्वीरों से मन नाउम्मीद हो गया … हालांकि हुक्मरान कह रहे हैं, किसी को बख्शेंगे नहीं.जगदलपुर में शहीदों को श्रद्धांजलि देने के बाद गृहमंत्री अमित शाह ने कहा देश जवानों के शौर्य और बलिदान को कभी भुला नहीं पाएगा. पूरा देश शोक संतप्त परिवारों के साथ खड़ा है. पिछले कुछ वर्षों में नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई निर्णायक मोड़ पर पहुंची है. इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना ने इसको और बढ़ाने का काम किया है, हम दो मुकाम और आगे पहुंचे हैं.

शाह ने कहा कि मैं देश को विश्वास दिलाना चाहता हूं कि नक्सलियों के खिलाफ ये लड़ाई रुकेगी नहीं, बल्कि और गति के साथ आगे बढ़ेगी. इस लड़ाई को अंजाम तक ले जाएंगे, नक्सलवादियों के खिलाफ हमारी जीत तय है.लेकिन इन दो सालों में कुछ तो ऐसा हुआ जिसकी वजह से इस जवान को गुहार लगानी पड़ी, कहना पड़ा मैं अनिल कुमार दुबे..आपका भाई, आपका बेटा. आपका भतीजा. मुठभेड़ में हमारे कई साथी मारे गए हैं और कई घायल हुए हैं, जिन्हें इलाज के लिए भर्ती कराया गया है.





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